अचानक ..........
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तुम मिले उस दिन
अचानक...........|
यूँ लगा ,
कोई
जाना पहचाना सा है ,
कोई
अपना अपना सा है |
इतने बरस का इंतज़ार
बीत गए
जाने कितने साल !
यादें कुछ धुंधली धुंधली सी
एकदम से ताज़ा हुई
अचानक ........|
समय की परतें खोलकर
तुम सामने आये ,
जाने पन्ने कितने
इतिहास के
खुले और खुलते चले गए |
तुम ही तो थे
जिसने जीना सिखाया ,
धूल में पड़ी थी कहीं
तराश कर नगीना बनाया |
फिर क्या हुआ
जो हाथ छुड़ा लिया था,
अचानक .........|
कितना ढूंढा था तुम्हे
तुम्हारे जाने के बाद ,
फिर बहती चली गई
जीवन की लहरों के साथ ,
बढती गई,
तुम्हारे दिखाए रास्ते पर |
इतना खोई मैं
कि तुम ही जा बैठे,
दिल के किसी
सुदूर कोने में |
पर आज
जब तुम्हे देखा,
ये विश्वास
हो गया पक्का,
कि इस दुनिया में
कुछ भी घट सकता है
अचानक ........|
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Mausi, the poem is lovely.. i love happy endings and this poem had that.. so liked it more :)
ReplyDeletethank u rati,hope aage bhi kuchh tumhare pasand ka likh paaun.
ReplyDeleteSo nicely expressed.....Heart Touching....
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