चाँदी के तार
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दिखने लगे चाँदी के तार
अभी तो हैं ये सिर्फ दो चार |
उम्र है ढलान पर
मन तू इसे स्वीकार कर |
जीवन की यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया
वक़्त की मार बड़ी बेरहम,
इससे भला कोई है बच पाया ?
तन और मन दोनों को मिले संकेत
क्या क्या बीता इन सालों में,
चल जरा पलट के देख |
एक एक कर बीतते गए जो पल,
कभी खिलखिलाना,कभी आँखें छलछल |
जीवन के सागर में अनुभवों के मोती,
चुन चुन कर आँचल में संजोती |
जो खोया,उसका क्या मलाल,
जो पाया,उसको रखें संभाल |
आज अच्छी तरह ये जाना,
खाली नहीं कोई पैमाना |
दो दुनी चार,ना चार दुनी आठ,
वक़्त सिखा देता सच्चा पाठ |
इस उम्र का शायद है यही स्वभाव,
झंझावातों के पार आ जाता ठहराव |
दिखने लगे चाँदी के तार
अभी तो हैं ये बस दो चार |
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